Wednesday, 3 December 2014

वीर्यरक्षण

वीर्यरक्षण

वीर्यरक्षण से पहले ब्रह्मचर्य क्या होता ह? यह पढ़े  ब्रह्मचर्य क्या है ? part-1


वीर्य की रक्षा को वीर्यरक्षण कहते है, खुद पर संयम रखना ब्रह्मचर्य कहलाता है।
ब्रह्मचर्य का पालन करना ही वीर्य रक्षण कहलाता है

वीयर्रक्षण ही जीवन है
   वीर्य इस शरीररूपी नगर का एक तरह से राजा ही है | यह वीयर्रूपी राजा यदि बलवान् है तो
रोगरूपी शत्रु कभी शरीररूपी नगर पर आक्रमण नही करते | जिसका वीयर्रूपी राजा निबर्ल हैउस शरीररूपी नगर को कई रोगरूपी शत्रु आकर घेर लेते हैं

वीर्यनाश ही मृत्यु है

वीर्य कैसे बनता है ?
    आयुर्वेद के मतानुसार मनुष्य के शरीर में सात धातु  होते हैं- जिनमें अन्तिम धातु वीर्य (शुक्र) है। वीर्य ही मानव शरीर का सारतत्व है। 
आइए जानें वीर्य बनने की प्रक्रिया-भोजन-रस-रक्त-मांस-मेदा-अस्थि-मज्जा-वीर्य। भोजन से रस बनने में 5 दिन लगते हैं फिर रस से रक्त बनने में 5 दिन लगते हैं। आगे 5-5 दिन का क्रम चलता है, तब कहीं जाकर अन्त में वीर्य बनता है। इस प्रकार भोजन से वीर्य तैयार होने में 35 दिन लग जाते हैं। 

मनुष्य एक दिन में औसतन 800 ग्राम भोजन करता है तो 35 दिन बाद आधा ग्राम वीर्य तैयार होता है। 40 बूंद रक्त से 1 बूंद वीर्य होता है। एक बार के वीर्य स्खलन से लगभग 15 ग्राम वीर्य का नाश होता है जो कि 30 दिन के 24 कि.ग्रा. भोजन से तैयार होता है।

कामवासना रोगी बनाने वाला है, बहुत बुरी तरह रोगी करने वाला है | बुरी तरह मारने वाला है | यह टेढ़ी चाल चलता है, मानिसक शक्तियों को नष्ट कर देता है | शरीर में से स्वास्थ्य, बल, आरोग्यता आदि को खोद-खोदकर बाहर फेंक देता है | शरीर की सब धातुओं को जला देता है | आत्मा को मिलन कर देता है शरीर के वात, पित, कफ को दूषित करके उसे तेजोहीन बना देता है |

वीर्य नाश से व्यक्ति कि हालत वैसी ही हो जाती ह जैसी गन्ने से रस निकलने के बाद गन्ने की होती है


सृष्टि के लिए मैथुन : एक प्राकृतिक व्यवस्था

   शरीर से वीर्य-व्यय यह कोई क्षिणक सुख के लिये प्रकृति की व्यवस्था नहीं है | सन्तानोत्पि के िलये
इसका वास्तिवक उपयोग है
यह सृष्टि चलती रहे, इसके लिए सन्तानोत्पि होना जरूरी है 
सन्तानोत्पत्ति ओर बात है और कामुकता के फेर में पडक़र अंधाधुंध वीर्य नाश करना बिलकुल भिन्न है। इस प्रकार के आचरण को संसार के सब विद्वान और विचारकों ने गर्हित तथा मानव जीवन को नष्ट-भ्रष्ट करने वाला माना है। 
शरीर के बल बुद्धि की सुरक्षा के लिये वीयर्रक्षण बहत आवस्यक है ,
अविवाहित रहना मात्र ब्रह्मचर्य नहीं कहलाता।
  
मैथुन के निम्नलिखित प्रकार शास्त्रों में कहे गये हैं
स्मरण किसी सुन्दर युवती, स्त्री या पुरुष के रूप-लावण्य अथवा हाव, भाव, कटाक्ष एवं श्रृंगार का स्मरण करना, काम क्रियाओं का स्मरण करना, अपने, भविष्य में किसी स्त्री या पुरुष के साथ मैथुन करने का संकल्प अथवा भावना करना, माला, किसी सुन्दर स्त्री अथवा पुरुष अश्लील चित्र का स्मरण करनाये सभी मानसिक मैथुन के अंतर्गत हैं |

श्रवणगंदे तथा कामोद्दीपक बातों, गानों को सुनना, स्त्रियों या पुरुष के रूप-लावण्य तथा अंगो का वर्णन सुनना, उनके हाव, भाव, कटाक्ष का वर्णन सुनना, कामविषयक बातें सुनना आदिये सभी श्रवणरूप मैथुन के अंतर्गत हैं |

कीर्तनअश्लील बातों का कथन, स्त्रियों या पुरुष के रूपलावण्य, यौवन एवं श्रृंगार की प्रशंसा तथा उनके हाव, भाव, कटाक्ष आदि का वर्णन, विलासिता का वर्णन, कामोद्दीपक अथवा गंदे गीत गाना तथा ऐसे साहित्य को स्वयं पढ़ना और दूसरों को सुनाना तथा कथा आदि में ऐसे प्रसंगों को विस्तार के साथ कहनाये सभी कीर्तनरूप मैथुन के अंतर्गत हैं |

प्रेक्षणस्त्रियों या पुरुष के रूप-लावण्य, श्रृंगार तथा उनके अंगों की रचना को देखना, किसी सुंदरी स्त्री अथवा पुरुष के रूप या चित्र को देखना, नाटक-सिनेमा देखना, कामोद्दीपक वस्तुओं के देखनायह सभी प्रेक्षण रूप मैथुन के अंतर्गत हैं

केलिस्त्रियों या पुरुषों के साथ हँसी-मजाक करना, नाचना-गाना, आमोद-प्रमोद करना , गन्दी चेष्टाएँ करना, स्त्रीसंग करना आदिये सभी केलिरूप मैथुन के अंतर्गत हैं |

श्रृंगारअपने को सुन्दर दिखलाने के लिए बाल सँवारना, कंघी करना, काकुल रखना, शरीर को वस्त्राभूषणादि से सजाना, इत्र, फुलेल, लवेंडर आदि का व्यवहार करना, फूलों की माला धारण करना, अंगराग लगाना, सुरमा लगाना, उबटन करना, साबुन-तेल लगाना, पाउडर लगाना, दाँतों में मिस्सी लगाना, दाँतों में सोना जड़वाना, शौक के लिए बिना आवश्यकता के चश्मा लगाना, होठ लाल करने के लिए पान खानायह सभी श्रृंगार के अंतर्गत है | दूसरों के चित्त को आकर्षण करने के उद्देश्य से किया हुआ यह सभी श्रृंगार कामोद्दीपक है

गुह्यभाषणस्त्रियों या पुरुषों के साथ एकांत में अश्लील बातें करना, उनके रूप-लावण्य , यौवन एवं श्रृंगार की प्रशंसा करना, हँसी-मजाक करनायह सभी गुह्यभाषणरूप मैथुन के अंतर्गत है

स्पर्शकामबुद्धि से किसी स्त्री अथवा पुरुष को स्पर्श करना, चुम्बन करना, आलिंगन करना,कामोद्दीपक पदार्थो का स्पर्श करना आदि यह सभी स्पर्शरूप मैथुन के अंतर्गत है|


स्वामी शिवानंद जी ने मैथुन के आठ प्रकार बताए हैं जिनसे बचना ही ब्रह्मचर्य है - 
1. स्त्रियों को कामुक भाव से देखना। 
2. उन्हें स्पर्श करना। 
3. सविलास की क्रीड़ा करना। 
4. स्त्री के गुणों की प्रशंसा करना। 
5. एकांत में संलाप करना। 
6. कामुक कर्म का दृढ़ निश्चय करना। 
7. तुष्टिकरण की कामना से स्त्री के निकट जाना। 
8. क्रिया निवृत्ति अर्थात् वास्तविक रति क्रिया 
    इसके अतिरिक्त विकृत यौनाचार से भी वीर्य की भारी क्षति हो जाती है। हस्तक्रिया (हस्त मैथुन) आदि इसमें शामिल है। शरीर में व्याप्त वीर्य कामुक विचारों के चलते अपना स्थान छोडऩे लगते हैं और अन्तत: स्वप्रदोष आदि के द्वारा बाहर आ जाता है। ब्रह्मचर्य का तात्पर्य वीर्य रक्षा से है। यह ध्यान रखने की बात है कि ब्रह्मचर्य शारीरिक व मानसिक दोनों प्रकार से होना जरूरी है।


स्त्री संग कितनी बार ?
सुकरात से एक व्यक्ति ने पूछा :
मनुष्य को स्त्री प्रसंग कितनी बार करनी चाहिए
जवाब में सुकरात ने कहा जीवन में एक बार।
व्यक्ति ने असंतोष व्यक्त करते हुए पूछा कि इतने से संतोष न हो तो
सुकरात ने कहा - वर्ष में एक बार। 
इससे भी सन्तुष्टि नहीं हुई तो 
माह में एक बार।
इससे भी सन्तुष्टि नहीं हुई तो 
माह में दो बार 
इससे भी  सन्तुष्टि नहीं हुई तो      
सप्ताह में एक बार
इससे भी  सन्तुष्टि नहीं हुई तो 


सुकरात ने कहा - ‘‘जाओ पहले सिर पर कफन बाँध लो और अपने लिए कब्र खुदवालो फिर चाहे जो भी करना हो करो।’’ 

Thursday, 27 November 2014

ब्रह्मचर्य क्या है ?


                                ॐ नमो भगवते महाबले पराक्रमाय
                                     मनोभिलाशितं मनः स्तंभ कुरु कुरु सवाहा


जीवन जीने की एक उत्तम कला

आइये सबसे पहले जानते है कि ब्रह्मचर्य क्या है?

    ब्रह्मचर्य, योग के आधारभूत स्तंभों में से एक है| ये वैदिक वर्णाश्रम का पहला आश्रम भी है, जिसके अनुसार ये ०-२५ वर्ष तक की आयु का होता है और जिस आश्रम का पालन करते हुए विद्यार्थियों को भावी जीवन के लिये शिक्षा ग्रहण करनी होती है।
ब्रह्मचर्य का यौगिक अर्थ है ब्रह्म की प्राप्ति के लिए वेदों का अध्ययन करना |

पुरातनकाल में हमारे गुरुकुल शिक्षा पद्धति में ब्रह्मचर्य अनिवार्य हुआ करता था। जिसका परिणाम था कि भारत हर क्षेत्र में शक्ति सम्पन्न रहा। ब्रह्मचर्य के प्रभाव से ही प्राचीन काल में वीर योद्धा, ज्ञानी, तपस्वी व ऋषि स्तर के लोग हुए जो दीर्घजीवी, निरोग, हृष्ट-पुष्ट, बलवान, बुद्धिमान, तेजस्वी, शूरवीर और दृढसंकल्प होते थे | |
ब्रह्मचर्य के बल से ही वे प्राणवायु को रोककर शरीर और मनकी शुद्धि के द्वारा नाना प्रकार के योग-साधनो में सफलता  प्राप्त करते थे | ब्रह्मचर्य के बलसे ही वे थोड़े ही समय में नाना प्रकार की विद्याओं को सीखकर अपने ज्ञान के द्वारा अपना और जगत का कल्याण करने में समर्थ होते थे | पर आज हमारा दुर्भाग्य है, कि पाश्चात्य अपसंस्कृति के प्रभाव में आकर हम बर्बाद हो गये। 

ब्रह्मचर्य का अर्थ अधिकतर यौन संयम समझा जाता है।  ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल यौन संयम से ही नहीं है, बल्कि इसका अर्थ अपने खान-पान पर भी नियंत्रण करना है।

ब्रह्मचर्य शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है:- ब्रह्म + चर्य। 

ब्रह्मचर्य का शब्दार्थ है वह आचरण जिससे ब्रह्म अर्थात् परमात्मा का साक्षात्कार होता है अर्थात ज्ञान प्राप्ति के लिए जीवन बिताना।

सर्व अवस्थाओं में मन, वचन और कर्म तीनों से मैथुन का सदैव त्याग हो, उसे ब्रह्मचर्य कहते हैं |
  
ब्रह्मचर्य का अर्थ ह इन्द्रियों और मन पर अपना नियंत्रण होना
 
भगवान वेदव्यासजी ने कहा है :
   विषय-इन्द्रियों द्वारा होने वाले सुख का संयमपूवर्क त्याग करना ब्रह्मचर्य है |

भगवान शंकर कहते हैं :
   वीयर्रक्षण होने के बाद कौन-सी सिद्धि है, जो साधक को प्राप्त नहीं हो सकती
ब्रह्मचर्य  ही उत्कृष्ट तप है | इससे बढ़कर तीनों  लोकों में दुसरा तप नही है,
ब्रह्मचर्य सब तपों में उतम तप है 

ब्रह्मचर्य का महिमा गान :- 

भगवान बुद्ध - ‘‘भोग और रोग साथी है और ब्रह्मचर्य आरोग्य का मूल है।’’

गुरुगोविन्द सिंह - ‘‘इंद्रिय संयम करो, ब्रह्मचर्य पालो, इससे तुम बलवान और वीर्यवान बनोगे।’’

आयुर्वेदाचार्य वाग्भट्ट - ‘‘संसार में जितना सुख है वह आयु के अधीन है और आयु ब्रह्मचर्य के अधीन है।’’

छांदोग्योपनिषद् - ‘‘एक तरफ चारों वेदों का उपदेश और दूसरी तरफ ब्रह्मचर्य, यदि दोनों की तौला जाए तो ब्रह्मचर्य का पलड़ा वेदों के उपदेश के पलड़े के बराबर रहता है।’’

भीष्मपितामह - ‘‘तीनों लोक के साम्राज्य का त्याग करना, स्वर्ग का अधिकार छोड़ देना, इससे भी कोई उत्तम वस्तु हो, उसको भी छोड़ देना परन्तु ब्रह्मचर्य को भंग न करना।’’

स्वामी रामतीर्थ - ‘‘जैसे दीपक का तेल-बत्ती के द्वारा ऊपर चढक़र प्रकाश  के रूप में परिणित होता है, वैसे ही ब्रह्मचारी के अन्दर का वीर्य सुषुम्रा नाड़ी द्वारा प्राण बनकर ऊपर चढ़ता हुआ ज्ञान-दीप्ति में परिणित हो जाता है।’’

प्रो० रौवसन - ‘‘ब्रह्मचारी की बुद्धि कुशाग्र और विशद होती है, उसकी वाणी मोहक होती है, उसकी स्मरण शक्ति तीव्र होती है, उसका स्वभाव आनन्दी और उत्साही होता है।’’

स्वामी विद्यानन्द - ‘‘ब्रह्मचर्य से परोपकार की वृत्ति जागृत होती है और परोपकार की वृत्ति के बिना किसी को मोक्ष मिलना सम्भव नहीं है।’’

आचार्य विनोबा भावे - ‘‘मैं नहीं कहता कि ब्रह्मचर्य आसान चीज है। हाँ विशाल कल्पना मन में रखोगे तो आसान हो जाएगा। ऊँचा आदर्श सामने रखना और उसके लिए संयमी जीवन का आचरण करना, इसको मैं ब्रह्मचर्य कहता हूँ।’’

ब्रह्मचर्य का रहस्य
ब्रह्मचर्य जीवन जीने की कला

     एक बार किसी ने स्वामी दयानंद जी से पूछाः "आपको कामदेव सताता है या नहीं ?" इस पर उन्होंने उतर दियाः "हाँ वह आता है, परंतु उसे मेरे मकान के बाहर ही खड़े रहना पड़ता क्योंकी वह मुझे कभी खाली ही नहीं पाता।"
ऋषि दयानंद अपने कार्य मे इतने व्यस्थ रहते थे की  उन्हे इधर-उधर की बातों के लिए फुरसत ही नहीं थी। यही उनके ब्रह्मचर्य का रहस्य था
इसलिय अपने जीवन का एक पल भी व्यर्थ मत गवाओ. स्वय को किसी न् किसी कार्य में खुद को व्यस्थ रखे | व्यस्थ रहने कि आदत डाले , खाली दिमाग ही शैतान का घर होता ह, इसलिए इसे व्यस्थ रखे . निठल्ले व्यक्ति को ही काम विकार आते ह|

     एक बार बचपन में स्वामी विवेकानंद जी पढ़ रहे थे तो उनकी नजर एक युवती पर पड़ी, दो तीन बार देखने के बाद स्वामी जी ने मन को समझाया कि “ ऐ मन, फिर से बुरी नजर से देखा तो तेरी खैर नही “ फिर भी मन नही माना तो उन्होंने रसोईघर से लाल मिर्च लेकर अपनी आंख डाल ली और आगे से सयंम में रहने कि कसम खाई |

         ब्रह्मचर्य रक्षा हेतु मन्त्र :
                       
                         ॐ नमो भगवते महाबले पराक्रमाय
                           मनोभिलाशितं मनः स्तंभ कुरु कुरु सवाहा

  
read next post also click  वीर्यरक्षण 

Tuesday, 11 November 2014