Thursday, 27 November 2014

ब्रह्मचर्य क्या है ?


                                ॐ नमो भगवते महाबले पराक्रमाय
                                     मनोभिलाशितं मनः स्तंभ कुरु कुरु सवाहा


जीवन जीने की एक उत्तम कला

आइये सबसे पहले जानते है कि ब्रह्मचर्य क्या है?

    ब्रह्मचर्य, योग के आधारभूत स्तंभों में से एक है| ये वैदिक वर्णाश्रम का पहला आश्रम भी है, जिसके अनुसार ये ०-२५ वर्ष तक की आयु का होता है और जिस आश्रम का पालन करते हुए विद्यार्थियों को भावी जीवन के लिये शिक्षा ग्रहण करनी होती है।
ब्रह्मचर्य का यौगिक अर्थ है ब्रह्म की प्राप्ति के लिए वेदों का अध्ययन करना |

पुरातनकाल में हमारे गुरुकुल शिक्षा पद्धति में ब्रह्मचर्य अनिवार्य हुआ करता था। जिसका परिणाम था कि भारत हर क्षेत्र में शक्ति सम्पन्न रहा। ब्रह्मचर्य के प्रभाव से ही प्राचीन काल में वीर योद्धा, ज्ञानी, तपस्वी व ऋषि स्तर के लोग हुए जो दीर्घजीवी, निरोग, हृष्ट-पुष्ट, बलवान, बुद्धिमान, तेजस्वी, शूरवीर और दृढसंकल्प होते थे | |
ब्रह्मचर्य के बल से ही वे प्राणवायु को रोककर शरीर और मनकी शुद्धि के द्वारा नाना प्रकार के योग-साधनो में सफलता  प्राप्त करते थे | ब्रह्मचर्य के बलसे ही वे थोड़े ही समय में नाना प्रकार की विद्याओं को सीखकर अपने ज्ञान के द्वारा अपना और जगत का कल्याण करने में समर्थ होते थे | पर आज हमारा दुर्भाग्य है, कि पाश्चात्य अपसंस्कृति के प्रभाव में आकर हम बर्बाद हो गये। 

ब्रह्मचर्य का अर्थ अधिकतर यौन संयम समझा जाता है।  ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल यौन संयम से ही नहीं है, बल्कि इसका अर्थ अपने खान-पान पर भी नियंत्रण करना है।

ब्रह्मचर्य शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है:- ब्रह्म + चर्य। 

ब्रह्मचर्य का शब्दार्थ है वह आचरण जिससे ब्रह्म अर्थात् परमात्मा का साक्षात्कार होता है अर्थात ज्ञान प्राप्ति के लिए जीवन बिताना।

सर्व अवस्थाओं में मन, वचन और कर्म तीनों से मैथुन का सदैव त्याग हो, उसे ब्रह्मचर्य कहते हैं |
  
ब्रह्मचर्य का अर्थ ह इन्द्रियों और मन पर अपना नियंत्रण होना
 
भगवान वेदव्यासजी ने कहा है :
   विषय-इन्द्रियों द्वारा होने वाले सुख का संयमपूवर्क त्याग करना ब्रह्मचर्य है |

भगवान शंकर कहते हैं :
   वीयर्रक्षण होने के बाद कौन-सी सिद्धि है, जो साधक को प्राप्त नहीं हो सकती
ब्रह्मचर्य  ही उत्कृष्ट तप है | इससे बढ़कर तीनों  लोकों में दुसरा तप नही है,
ब्रह्मचर्य सब तपों में उतम तप है 

ब्रह्मचर्य का महिमा गान :- 

भगवान बुद्ध - ‘‘भोग और रोग साथी है और ब्रह्मचर्य आरोग्य का मूल है।’’

गुरुगोविन्द सिंह - ‘‘इंद्रिय संयम करो, ब्रह्मचर्य पालो, इससे तुम बलवान और वीर्यवान बनोगे।’’

आयुर्वेदाचार्य वाग्भट्ट - ‘‘संसार में जितना सुख है वह आयु के अधीन है और आयु ब्रह्मचर्य के अधीन है।’’

छांदोग्योपनिषद् - ‘‘एक तरफ चारों वेदों का उपदेश और दूसरी तरफ ब्रह्मचर्य, यदि दोनों की तौला जाए तो ब्रह्मचर्य का पलड़ा वेदों के उपदेश के पलड़े के बराबर रहता है।’’

भीष्मपितामह - ‘‘तीनों लोक के साम्राज्य का त्याग करना, स्वर्ग का अधिकार छोड़ देना, इससे भी कोई उत्तम वस्तु हो, उसको भी छोड़ देना परन्तु ब्रह्मचर्य को भंग न करना।’’

स्वामी रामतीर्थ - ‘‘जैसे दीपक का तेल-बत्ती के द्वारा ऊपर चढक़र प्रकाश  के रूप में परिणित होता है, वैसे ही ब्रह्मचारी के अन्दर का वीर्य सुषुम्रा नाड़ी द्वारा प्राण बनकर ऊपर चढ़ता हुआ ज्ञान-दीप्ति में परिणित हो जाता है।’’

प्रो० रौवसन - ‘‘ब्रह्मचारी की बुद्धि कुशाग्र और विशद होती है, उसकी वाणी मोहक होती है, उसकी स्मरण शक्ति तीव्र होती है, उसका स्वभाव आनन्दी और उत्साही होता है।’’

स्वामी विद्यानन्द - ‘‘ब्रह्मचर्य से परोपकार की वृत्ति जागृत होती है और परोपकार की वृत्ति के बिना किसी को मोक्ष मिलना सम्भव नहीं है।’’

आचार्य विनोबा भावे - ‘‘मैं नहीं कहता कि ब्रह्मचर्य आसान चीज है। हाँ विशाल कल्पना मन में रखोगे तो आसान हो जाएगा। ऊँचा आदर्श सामने रखना और उसके लिए संयमी जीवन का आचरण करना, इसको मैं ब्रह्मचर्य कहता हूँ।’’

ब्रह्मचर्य का रहस्य
ब्रह्मचर्य जीवन जीने की कला

     एक बार किसी ने स्वामी दयानंद जी से पूछाः "आपको कामदेव सताता है या नहीं ?" इस पर उन्होंने उतर दियाः "हाँ वह आता है, परंतु उसे मेरे मकान के बाहर ही खड़े रहना पड़ता क्योंकी वह मुझे कभी खाली ही नहीं पाता।"
ऋषि दयानंद अपने कार्य मे इतने व्यस्थ रहते थे की  उन्हे इधर-उधर की बातों के लिए फुरसत ही नहीं थी। यही उनके ब्रह्मचर्य का रहस्य था
इसलिय अपने जीवन का एक पल भी व्यर्थ मत गवाओ. स्वय को किसी न् किसी कार्य में खुद को व्यस्थ रखे | व्यस्थ रहने कि आदत डाले , खाली दिमाग ही शैतान का घर होता ह, इसलिए इसे व्यस्थ रखे . निठल्ले व्यक्ति को ही काम विकार आते ह|

     एक बार बचपन में स्वामी विवेकानंद जी पढ़ रहे थे तो उनकी नजर एक युवती पर पड़ी, दो तीन बार देखने के बाद स्वामी जी ने मन को समझाया कि “ ऐ मन, फिर से बुरी नजर से देखा तो तेरी खैर नही “ फिर भी मन नही माना तो उन्होंने रसोईघर से लाल मिर्च लेकर अपनी आंख डाल ली और आगे से सयंम में रहने कि कसम खाई |

         ब्रह्मचर्य रक्षा हेतु मन्त्र :
                       
                         ॐ नमो भगवते महाबले पराक्रमाय
                           मनोभिलाशितं मनः स्तंभ कुरु कुरु सवाहा

  
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Tuesday, 11 November 2014